तीसरा वार्ड – जहाँ मरीज़ों से ज़्यादा नाम ग़ायब होते हैं | डरावनी कहानी

 

तीसरा वार्ड – अस्पताल की डरावनी कहानी


शहर के पुराने हिस्से में एक अस्पताल था, जो आज भी दिन में पूरी तरह चालू रहता था। लोग आते थे, इलाज कराते थे और शाम होते ही अपने-अपने घर लौट जाते थे। लेकिन रात के बारे में वहाँ काम करने वाले लोग ज़्यादा बात नहीं करते थे। कहा जाता था कि रात की शिफ्ट में सब कुछ वही रहता है, बस मरीज़ों की गिनती कभी पूरी नहीं मिलती। रिकॉर्ड में नाम कम होते थे, लेकिन बेड हमेशा भरे दिखते थे। 

न कोई शोर, न कोई चीख—बस कभी-कभी ऐसा लगता था जैसे किसी ने घंटी बजाई हो, जबकि नर्सिंग स्टेशन पर कोई नहीं होता था। सुबह पूछने पर सब कहते थे, “शायद थकान होगी।” मगर हर रात एक ही वार्ड में लाइट सबसे आख़िर में बंद होती थी। और अजीब बात ये थी कि उस वार्ड में भर्ती किसी भी मरीज़ का नाम, अगली सुबह फाइल में नहीं मिलता था।

*वह वार्ड और वे फ़ाइलें जो मेल नहीं खातीं


उस अस्पताल में कुल सात वार्ड थे, लेकिन रात की शिफ्ट में ज़्यादातर ध्यान एक ही वार्ड पर टिक जाता था—तीसरा वार्ड। दिन में वह बिल्कुल सामान्य लगता था। सफ़ेद दीवारें, साफ़ बेडशीट, धीमी आवाज़ में चलती मशीनें। कोई भी बाहर से देखकर यह नहीं कह सकता था कि यहाँ कुछ अलग है। अलगपन तब शुरू होता था, जब शाम की शिफ्ट रात की शिफ्ट में बदलती।


हर रात, नर्सिंग स्टेशन पर मरीज़ों की गिनती दो बार की जाती थी। एक बार शाम को, और एक बार आधी रात के बाद। नियम सीधा था—जितने नाम फ़ाइल में, उतने ही मरीज़ बेड पर। लेकिन तीसरे वार्ड में यह हिसाब कभी पूरा नहीं बैठता था। कभी एक बेड ज़्यादा होता। कभी एक नाम कम।

शुरुआत में इसे रिकॉर्ड की गलती माना गया। नर्सें आपस में पन्ने पलटतीं, तारीख़ें चेक करतीं, और फिर बात ख़त्म कर देतीं। लेकिन दिक्कत ये थी कि गलती हमेशा एक ही जगह होती थी—तीसरा वार्ड।


उस वार्ड की फ़ाइलें बाक़ी वार्ड्स से अलग रखी जाती थीं। वजह कोई नहीं बताता था, बस “ऐसा ही चलता है” कहकर बात टाल दी जाती थी। उन फ़ाइलों में नाम साफ़-साफ़ लिखे होते थे, उम्र, बीमारी, एडमिट होने की तारीख़—सब कुछ। लेकिन डिस्चार्ज कॉलम अक्सर खाली रहता था।

एक नर्स ने एक बार मज़ाक में कहा था,

“लगता है यहाँ से लोग जाते नहीं, बस हट जाते हैं।”


किसी ने हँसा नहीं। सबसे अजीब बात यह थी कि जो नाम रात की फ़ाइल में नहीं मिलते थे, वो दिन की फ़ाइल में कभी थे ही नहीं। जैसे वो मरीज़ सिर्फ़ रात के लिए मौजूद होते हों। सुबह डॉक्टर राउंड पर आते, इलाज करते, दवाइयाँ लिखते—और किसी को यह महसूस नहीं होता कि एक बेड कल रात भरा हुआ था।


वार्ड बॉय को भी इस बात का अंदाज़ा था। वह बेड गिनते समय अक्सर एक पल रुक जाता था, फिर आगे बढ़ जाता था। पूछने पर बस इतना कहता,

“कभी-कभी नंबर मिलते नहीं हैं।”


तीसरे वार्ड में लगी घंटी सबसे ज़्यादा बजती थी। लेकिन जब कोई देखने जाता, तो किसी ने दबाया ही नहीं होता। मशीनें ठीक थीं, तार सही थे। फिर भी घंटी बजती रहती थी—ज़्यादातर रात के समय।


एक रात एक जूनियर नर्स ने गलती से तीसरे वार्ड की पुरानी फ़ाइलें निकाल लीं। तारीख़ें पीछे जाती रहीं, नाम बदलते रहे, लेकिन एक बात हर फ़ाइल में एक-सी थी—हर कुछ पन्नों के बाद एक नाम काटा हुआ था। न डिस्चार्ज लिखा था, न मौत। बस नाम के ऊपर एक सीधी लाइन।


उसने सीनियर से पूछा, “ये नाम क्यों काटे गए हैं?”


जवाब सीधा नहीं था। बस इतना कहा गया— “उनके बारे में अब रिकॉर्ड नहीं रखा जाता।” उस रात के बाद उस नर्स ने तीसरे वार्ड में ड्यूटी बदलवा ली। और तब पहली बार किसी ने यह सवाल मन में रखा— अगर रिकॉर्ड से नाम हटाए जा सकते हैं, तो क्या वार्ड से लोग भी हटाए जा सकते हैं?


उस सवाल का जवाब अभी किसी के पास नहीं था। लेकिन तीसरा वार्ड, अब सिर्फ़ एक जगह नहीं रहा था— वह एक गिनती बन चुका था, जो कभी पूरी नहीं होती थी।


*रात की शिफ्ट और वे बातें जो लिखी नहीं जातीं


रात की शिफ्ट करने वाले लोग दिन की तरह नहीं होते। वे कम बोलते हैं, ज़्यादा देखते हैं, और बहुत सी बातों को अपने तक ही रखते हैं। अस्पताल में भी यही हाल था। दिन में जो बातें हँसी में उड़ जाती थीं, रात में वही बातें बिना आवाज़ के साथ चलती थीं।


तीसरे वार्ड की रात की ड्यूटी हमेशा एक जैसी नहीं रहती थी। नर्सें बदलती थीं, वार्ड बॉय बदलते थे, गार्ड भी। लेकिन कुछ हफ़्तों के बाद, हर नया इंसान वही आदतें अपनाने लगता था—बिना किसी के कहे।


कोई भी तीसरे वार्ड में ज़्यादा देर खड़ा नहीं रहता था। दवाइयाँ रखकर तुरंत बाहर आ जाना, घंटी बजने पर पहले बाहर से सुनना, और अंदर जाने से पहले एक पल रुकना—ये सब जैसे अनलिखे नियम थे।


एक सीनियर नर्स थी, जिसने सबसे ज़्यादा रातें उस वार्ड में काटी थीं। वह कभी डर की बात नहीं करती थी, लेकिन एक बात हमेशा कहती थी—

“अगर रात में किसी मरीज़ ने नाम लेकर बुलाया… तो जवाब मत देना।”


किसी ने उससे पूछा नहीं कि ऐसा क्यों।


गार्ड का अनुभव अलग था। उसे तीसरे वार्ड के बाहर लगे CCTV से ज़्यादा परेशानी होती थी। कैमरा काम करता था, रिकॉर्डिंग भी होती थी, लेकिन कुछ देर के लिए स्क्रीन हल्की-सी धुंधली हो जाती थी। न पूरी तरह बंद, न साफ़। बस इतनी कि चेहरे पहचान में न आएँ।


एक बार उसने देखा कि वार्ड के अंदर किसी बेड पर कोई बैठा है। वह अंदर गया, लाइट जलाई—बेड खाली था। वापस आकर स्क्रीन देखी, तो वहाँ कुछ भी नहीं था। उसने उस क्लिप को सेव नहीं किया। अगली रात कैमरा अपने-आप रीसेट हो गया।


वार्ड बॉय अक्सर कहता था कि तीसरे वार्ड के बेड हल्के होते जा रहे हैं। शुरू में यह मज़ाक लगा, लेकिन जब नए बेड मंगवाए गए, तब भी वही एहसास बना रहा। जैसे उन पर रखा वज़न हर रात बदलता हो।


रात के समय मरीज़ों की आवाज़ें भी अजीब थीं। कोई दर्द में चिल्लाता नहीं था। बस कभी-कभी किसी का नाम लिया जाता था—धीमे से। नर्सें बाद में बताती थीं कि आवाज़ सुनकर लगता था जैसे कोई बात अधूरी छोड़ दी गई हो।


सबसे ज़्यादा बेचैनी उस समय होती थी, जब शिफ्ट खत्म होने वाली होती थी। लोग घड़ी देखने लगते थे, लेकिन किसी को जल्दी जाने की खुशी नहीं होती थी। ऐसा लगता था जैसे वार्ड किसी को जाने देना नहीं चाहता।


एक नर्स ने एक बार रजिस्टर में लिखा—

“तीसरे वार्ड की गिनती आज भी पूरी नहीं हुई।”


अगली सुबह वह लाइन काट दी गई थी।

किसने काटी—किसी को नहीं पता।


उसके बाद से रात की शिफ्ट में लिखने से ज़्यादा, लोग याद रखने लगे।

और याद रखने की सबसे बड़ी बात यही थी—


तीसरा वार्ड कभी कुछ करता नहीं था।

वह बस… लोगों से कुछ कम कर देता था।


नाम।

यादें।

और कभी-कभी, मौजूदगी।


और यही वजह थी कि एक रात,

जब तीसरे वार्ड में एक बेड अचानक खाली मिला,

तो किसी ने सवाल नहीं किया।


क्योंकि सबको पता था—

अब अगला क़दम लिखा नहीं जाएगा।


वह रात, जब कुछ लिख दिया गया


वह रात बाकी रातों जैसी ही लग रही थी। शिफ्ट बदली, लाइटें जलीं, रजिस्टर खोले गए। तीसरा वार्ड अपने तय ढंग से शांत था। न कोई अतिरिक्त आवाज़, न कोई हड़बड़ी। अगर कोई बाहर से देखता, तो उसे लगता कि यहाँ सब कुछ नियंत्रण में है।


लेकिन उस रात ड्यूटी पर एक नई नर्स थी। ज़्यादा नई नहीं, बस इतनी कि अभी उसने “नज़रअंदाज़ करना” पूरी तरह नहीं सीखा था। उसने नियम पढ़े थे, आदतें देखी थीं, लेकिन मन में सवाल अब भी थे। आधी रात के बाद, जब मरीज़ों की गिनती दोबारा की गई, तीसरे वार्ड में फिर वही हुआ। नाम कम थे। बेड पूरे थे। उसने दोबारा गिना। फिर तीसरी बार। इस बार उसने कुछ अलग किया। उसने रजिस्टर बंद नहीं किया।


उसने उस बेड के सामने एक निशान लगाया, जिसके सामने कोई नाम नहीं था। न पूरा वाक्य, न शिकायत—बस एक छोटा सा चिह्न। जैसे खुद को याद दिलाने के लिए कि यह देखा गया है। ठीक उसी समय, वार्ड की घंटी बजी। वह आवाज़ तेज़ नहीं थी। बस एक बार। जैसे किसी ने उँगली रखकर तुरंत हटा ली हो। नर्स ने पहले बाहर से झाँका। सब शांत था। अंदर जाकर उसने बेड देखे—सब वैसे ही थे।


वह वापस मुड़ी, और तभी उसे महसूस हुआ कि कमरे में हवा थोड़ी बदल गई है। ठंडी नहीं, भारी। जैसे किसी ने साँस ली हो और छोड़ी न हो।


उसने घड़ी देखी— 3:12 am 


पहली बार था जब तीसरे वार्ड में कुछ देरी से हुआ था।


वह रजिस्टर लेकर नर्सिंग स्टेशन की तरफ़ बढ़ी, लेकिन रास्ते में रुक गई। पीछे से कोई आवाज़ नहीं आई थी। फिर भी उसे लगा कि वह अकेली नहीं है। यह एहसास डर जैसा नहीं था—बल्कि ऐसा, जैसे कोई बहुत पास खड़ा हो और जानता हो कि वह क्या करने जा रही है।


उसने वापस जाकर रजिस्टर खोला। जो निशान उसने लगाया था…वह अब वहाँ नहीं था। उसकी जगह एक लाइन थी।

सीधी।

साफ़।

उसने नहीं लिखी थी। उस पल उसने पहली बार यह समझा कि तीसरा वार्ड चीज़ों को हटाता नहीं है। वह उन्हें ठीक करता है—अपने हिसाब से।


गार्ड ने बाद में बताया कि उस समय CCTV कुछ सेकंड के लिए फ्रीज़ हो गया था। स्क्रीन पर वार्ड दिख रहा था, लेकिन नर्स नहीं। जैसे वह फ्रेम से बाहर चली गई हो। कैमरा बंद नहीं हुआ था, बस रिकॉर्ड करने के लिए कुछ बचा नहीं था।


कुछ मिनट बाद नर्स वापस दिखी। सामान्य। शांत। उसने रजिस्टर बंद किया, बिना कुछ कहे अपनी ड्यूटी पूरी की। किसी ने उससे कुछ नहीं पूछा। उसने भी कुछ नहीं बताया। सुबह की शिफ्ट में जब फाइलें चेक हुईं, तो तीसरे वार्ड की गिनती पूरी थी।

हर बेड के सामने नाम था। कोई खाली जगह नहीं। लेकिन उस रात ड्यूटी पर रही नर्स का नाम, अगले हफ्ते की शिफ्ट लिस्ट में नहीं था।

न ट्रांसफर।

न छुट्टी।

बस नाम हटा दिया गया था। और किसी ने यह सवाल नहीं किया कि अगर एक निशान मिट सकता है, तो क्या इंसान भी… बस रिकॉर्ड से हटाया जा सकता है?


उस रात के बाद,

तीसरे वार्ड में

किसी ने फिर कभी

कुछ लिखने की कोशिश नहीं की।


आज का अस्पताल और वह गिनती जो कोई पूरी नहीं करता


आज भी वह अस्पताल दिन में पूरी तरह चालू है। बाहर बोर्ड पर नाम चमकता है, अंदर रिसेप्शन पर लोग लाइन में खड़े रहते हैं। डॉक्टर आते हैं, दवाइयाँ लिखी जाती हैं, और हर फ़ाइल को तय प्रक्रिया के अनुसार रखा जाता है। बाहर से देखने वाला कोई यह नहीं कह सकता कि यहाँ कुछ अधूरा है।


लेकिन रात की शिफ्ट अब अलग है।


तीसरा वार्ड आज भी खुला है, पर उसकी गिनती अब नहीं की जाती। रजिस्टर में उसके लिए एक अलग पन्ना रखा जाता है—ज़्यादातर खाली। नर्सें जानती हैं कि वहाँ कितने बेड हैं, लेकिन नंबर ज़ोर से नहीं बोलतीं। वार्ड बॉय दवाइयाँ रखकर बिना रुके बाहर आ जाते हैं। गार्ड CCTV देखता है, पर तीसरे वार्ड की स्क्रीन पर ज़्यादा देर नहीं रुकता।


अब घंटी भी कम बजती है। या शायद बजती है, लेकिन कोई ध्यान नहीं देता। कुछ आवाज़ें ऐसी होती हैं, जिनका जवाब देना ज़रूरी नहीं होता।


नए स्टाफ़ को कुछ नहीं बताया जाता। उन्हें बस इतना कहा जाता है—

“तीसरे वार्ड में काम जल्दी निपटा लेना।”


कोई नहीं पूछता कि क्यों।


कभी-कभी कोई मरीज़ दिन में पूछ लेता है कि रात में वार्ड इतना शांत क्यों रहता है। जवाब हमेशा एक-सा होता है—

“इलाज ठीक चल रहा है।”


फाइलें अब साफ़-सुथरी रखी जाती हैं। नाम काटे नहीं जाते। बस लिखे भी नहीं जाते। जो नहीं लिखा होता, वही सबसे सुरक्षित रहता है।


और हर रात, जब आधी से ज़्यादा लाइटें बंद हो चुकी होती हैं, तीसरे वार्ड में बेड हमेशा भरे दिखाई देते हैं। चाहे नाम हों या न हों।


कभी कोई नई नर्स उस खाली पन्ने को देख लेती है। पल भर के लिए कलम उठती है… फिर रख दी जाती है। क्योंकि अब सबको पता है—कुछ चीज़ें दर्ज करने से पहले, यह सोचना ज़रूरी है कि क्या वे रिकॉर्ड में रहने लायक हैं। उस अस्पताल में आज भी एक नियम चलता है, जिसे कहीं लिखा नहीं गया—

अगर गिनती पूरी न हो, तो उसे पूरा करने की कोशिश मत करो।  क्योंकि तीसरा वार्ड खुद गिनती तय करता है।

और अगर किसी रात किसी बेड के सामने तुम्हारा नाम लिखा मिले—

तो समझ लेना,

तुम्हारी शिफ्ट

अब ख़त्म हो चुकी है।

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