गेस्ट हाउस रूम नंबर 17: कब्रिस्तान की वो काली रात और अधूरा इंतकाम
हिमालय की गोद में बसे नैनीताल के रास्ते जितने खूबसूरत दिन में लगते हैं, सूरज ढलते ही वे उतने ही जानलेवा और डरावने हो जाते हैं। 'विश्राम गेस्ट हाउस' उन्हीं रास्तों के बीच बसी एक ऐसी जगह थी, जिसके बारे में स्थानीय टैक्सी ड्राइवर भी बात करने से कतराते थे। यह कहानी है समीर की, जिसने एक रात उस गेस्ट हाउस के कमरा नंबर 17 में कदम रखा और फिर उसकी दुनिया हमेशा के लिए बदल गई.
1. पहाड़ों की वो जानलेवा रात
समीर दिल्ली की एक नामी मार्केटिंग कंपनी में काम करता था। काम के सिलसिले में उसे नैनीताल जाना था। वह अपनी कार से अकेले ही निकला था। पहाड़ों पर चढ़ाई शुरू ही हुई थी कि मौसम ने करवट ली। आसमान में बिजली कड़कने लगी और इतनी तेज़ बारिश शुरू हुई कि कार के वाइपर भी जवाब दे गए। सड़क पर सन्नाटा ऐसा था कि समीर को अपनी ही सांसों की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
रात के करीब 11:30 बज रहे थे। अचानक, एक ज़ोरदार आवाज़ के साथ कार का बायां टायर फट गया। समीर ने किसी तरह गाड़ी को किनारे लगाया। बाहर निकलना मौत को दावत देने जैसा था, लेकिन वह वहां रुक भी नहीं सकता था। तभी उसे झाड़ियों के पीछे एक पुराना, जंग लगा हुआ बोर्ड दिखा— "विश्राम गेस्ट हाउस - मात्र 500 मीटर"।
उसने सोचा कि रात गुज़ारने के लिए यह जगह ठीक रहेगी। वह अपना भारी बैग उठाकर पैदल ही उस दिशा में चल पड़ा। रास्ता संकरा था और दोनों तरफ ऊंचे-ऊंचे चीड़ के पेड़ थे जो तेज़ हवा में ऐसी आवाज़ कर रहे थे जैसे कोई रो रहा हो।
2. विश्राम गेस्ट हाउस: जहाँ मौत विश्राम करती है
जैसे ही समीर गेस्ट हाउस के गेट पर पहुँचा, उसे एक अजीब सी बेचैनी महसूस हुई। वह इमारत किसी अंग्रेज़ ज़माने की पुरानी हवेली जैसी थी। लकड़ी के खंभे सड़ चुके थे और दीवारों की पपड़ी उतर रही थी। उसने भारी मन से दरवाज़ा खटखटाया।
करीब दो मिनट बाद, दरवाज़ा एक भारी चरमराहट के साथ खुला। सामने एक बुज़ुर्ग खड़ा था, जिसका चेहरा इतना सफेद था मानो उसके शरीर में खून की एक बूंद भी न हो। उसकी एक आँख आधी बंद थी और वह एक पैर से लंगड़ाकर चल रहा था।
"साहब, इस वक्त यहाँ?" उस बुज़ुर्ग की आवाज़ किसी सूखी हुई लकड़ी के टूटने जैसी थी।
समीर ने अपनी समस्या बताई। बुज़ुर्ग ने एक फीकी मुस्कान के साथ कहा, "ठीक है, लेकिन सिर्फ एक कमरा खाली है— रूम नंबर 17। और याद रखना बेटा, रात को चाहे कोई भी पुकारे, खिड़की मत खोलना।"
समीर ने सोचा कि शायद जंगली जानवरों के डर से वह ऐसा कह रहा है। उसने चाबी ली और सीढ़ियाँ चढ़ने लगा। हर कदम पर लकड़ी के फर्श से निकलने वाली 'चर्र-चर्र' की आवाज़ समीर के दिल की धड़कनें बढ़ा रही थी।
3. रूम नंबर 17 का रहस्यमय सन्नाटा
कमरा नंबर 17 गलियारे के आखिरी कोने में था। जैसे ही समीर ने ताला खोला, उसे एक तेज़ सीलन और मरे हुए चूहे जैसी बदबू आई। कमरे में एक पुराना पलंग, एक टूटा हुआ आईना और एक अलमारी थी। सबसे अजीब बात यह थी कि कमरे की खिड़की बहुत बड़ी थी, जिसके भारी काले पर्दे हवा में हिल रहे थे।
समीर ने अपना बैग रखा और हाथ-मुँह धोने के लिए बाथरूम में गया। जैसे ही उसने आईने में देखा, उसे लगा कि उसके पीछे कोई खड़ा है। उसने झटके से पीछे मुड़कर देखा, लेकिन वहाँ कोई नहीं था। उसने सोचा कि शायद थकान की वजह से उसे वहम हो रहा है।
वह बिस्तर पर लेटा ही था कि उसे कमरे की दीवार के पीछे से कुछ खुरचने की आवाज़ आने लगी। "खुर्र... खुर्र... खुर्र..." ऐसा लग रहा था जैसे कोई अपने नाखूनों से लकड़ी को छील रहा हो।
4. कब्रिस्तान का वो खौफनाक नज़ारा (12:45 AM)
नींद आने ही वाली थी कि समीर को बाहर से एक मधुर, लेकिन उदास संगीत सुनाई दिया। कोई औरत गा रही थी। वह आवाज़ इतनी सम्मोहक थी कि समीर अपनी सुध-बुध खो बैठा। वह भूल गया कि मैनेजर ने उसे क्या चेतावनी दी थी। उसने उठकर कमरे की भारी खिड़की के पर्दे हटा दिए।
खिड़की खुलते ही जो नज़ारा सामने था, उसने समीर की रूह कँपा दी। गेस्ट हाउस की पिछली दीवार से सटा हुआ एक विशाल कब्रिस्तान था। हज़ारों पुरानी कब्रें, जिन पर काई जमी हुई थी, चांदनी रात में चमक रही थीं।
वहां कब्रिस्तान के बीचों-बीच, एक सफेद लिबास में औरत खड़ी थी। वह अपनी कब्र की मिट्टी को हाथों से कुरेद रही थी। अचानक, उसने अपना सिर ऊपर उठाया। उसकी आँखें नहीं थीं, सिर्फ गहरे गड्ढे थे। उसने समीर की तरफ अपना हाथ बढ़ाया और एक भयानक चीख मारी।
5. 1990 का वो काला इतिहास
समीर डर के मारे पीछे हटा और फर्श पर गिर गया। गिरते ही उसका हाथ बेड के नीचे रखे एक पुराने संदूक पर पड़ा। उसने घबराहट में उसे खोला, तो अंदर कुछ पुराने अख़बार के टुकड़े मिले।
अख़बार की सुर्खी थी: "गेस्ट हाउस के रूम नंबर 17 में 5 लोगों की रहस्यमय मौत"।
रिपोर्ट के मुताबिक, 30 साल पहले उस मैनेजर ने एक तांत्रिक के कहने पर वहां रुकने वाले मेहमानों को सोते समय मार दिया था ताकि वह कब्रिस्तान की रूहों को खुश कर सके। बाद में मैनेजर ने खुद भी फांसी लगा ली थी।
समीर को अब समझ आया—वह मैनेजर इंसान नहीं, बल्कि एक प्रेत था जो अभी भी मेहमानों को मौत के कमरे तक पहुँचा रहा था। तभी कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया और ताला लगने की आवाज़ आई।
6. मौत से रूबरू और आखिरी संघर्ष
कमरे का तापमान अब शून्य से नीचे जा चुका था। आईने पर भाप जम गई और उस पर अपने आप अक्षर उभरने लगे— "अब तुम्हारी बारी है"।
मैनेजर की रूह अब कमरे के कोने में खड़ी थी। उसकी गर्दन अब पूरी तरह मुड़ चुकी थी और उसके हाथ लंबे होकर समीर की गर्दन तक पहुँच रहे थे। खिड़की से वही सफेद साये अब कमरे के अंदर रेंगने लगे थे।
समीर ने अपनी जेब से कार की चाबी निकाली, जिसमें एक छोटा सा हनुमान चालीसा का यंत्र लगा था। उसने उसे हाथ में लेकर ज़ोर-ज़ोर से चिल्लाना शुरू किया। पूरे कमरे में एक कंपन पैदा हुआ। रूहें पीछे हटने लगीं। समीर ने अपनी पूरी ताकत लगाकर कमरे की खिड़की से नीचे छलांग लगा दी।
वह सीधे कब्रिस्तान की नरम मिट्टी पर गिरा। वह उठा और बिना पीछे मुड़े, झाड़ियों और कांटों को चीरते हुए हाईवे की तरफ भागा। उसे पीछे से हज़ारों आवाज़ें सुनाई दे रही थीं, जो उसे वापस बुला रही थीं।
7. सुबह का खौफनाक सच
अगली सुबह, एक ट्रक ड्राइवर ने समीर को बेहोश हालत में हाईवे के किनारे पाया। जब समीर ने पुलिस को सारी बात बताई, तो वे उसे उस जगह ले गए।
वहां पहुँचकर समीर के पैरों तले ज़मीन खिसक गई। वहां कोई 'विश्राम गेस्ट हाउस' नहीं था। वहां सिर्फ एक जल चुकी पुरानी हवेली का ढांचा था, जो झाड़ियों से ढका हुआ था। लेकिन सबसे डरावनी बात यह थी कि उस मलबे के बीच, वही कमरा नंबर 17 की पीतल की चाबी ज़मीन पर पड़ी थी, जिस पर समीर के खून के निशान थे।
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